भू-परिवर्तन विभाग के पास पर्याप्त  स्टॉफ नहीं, काम कैसे पूरा होगा!
 

इंदौर। जमीनों के दस्तावेज, नामांतरण तथा बंटवारे के साथ ही जमीनों के रिकॉर्ड को संधारित करने का दायित्व संभालने वाले भू-परिवर्तन विभाग में पर्याप्त अमला नहीं है। जिले में मात्र 5 सहायक अधीक्षक भू-अभिलेख हैं और बाबुओं की संख्या न के बराबर है। एक ही बाबू के पास कई तरह की जिम्मेदारियां सौंपी गई, जो समय पर पूरी नहीं हो पाती। 

  जिले में अभी तक अधीक्षक का पद रिक्त ही है, जहां सहायक अधीक्षक ही जिम्मेदारी संभाले हुए हैं। इसी तरह विभाग पटवारी और राजस्व निरीक्षकों का मूल  विभाग होने के बावजूद उसके पास इनकी संख्या भी न के बराबर ही है। सभी को तहसीलों में पदस्थ किया गया है। शाखा में कोई भी काम करना ही नहीं चाहता है। वे अतिरिक्त कार्य के रूप में ही इस शाखा से मिलने वाले आवेदनों पर अपनी टीप प्रस्तुत करते हैं। सरकार ने व्यपर्वतन की धारा-172 को विलोपित करते हुए व्यक्ति को स्वयं ही जमीन की दर निकालकर राशि जमा कराकर एसडीओ को सूचना देने के नियम बनाते हुए धारा 59 को मजबूत बना दिया है। यहां पर जमीनों के व्यपवर्तन के बाद विकसित होने वाली कॉलोनियों के कर्ताधर्ता सैकड़ों प्लॉट धारियों के एकमुश्त नामांतरण के आवेदन प्रस्तुत करते हैं। इन आवेदनों का निराकरण एक अधिकारी को 90 दिन में करना मुश्किल हो जाता है। प्रक्रिया के अनुसार सबसे पहले 15 दिवस की उद्घोषणा अखबारों में प्रकाशित कराने के बाद इसमें राजस्व निरीक्षक से टीप मांगी जाती है, जो 20 से लेकर 30 दिन के अंदर ही विभाग को वापस मिलती है। बाबू के पास एक साथ कई काम होने के कारण वह समय रहते इन फाइलों को आगे नहीं बढ़ा पाता और सारा दोष अधिकारियों पर आ जाता है। भू- परिवर्तन शाखा में इंदौर की 10 तहसीलों में मात्र 5 सहायक अधीक्षक और 8 बाबू होने से काम समय पर नहीं हो पा रहे है, वहीं विभाग का सॉफ्टवेयर भी सही तरीके से काम नहीं करने के कारण ऑनलाइन जानकारी और बकाया राशि की जानकारी भी सामने नहीं आ पा रही! जहां एक ओर विभाग में मानवीय संसाधनों की कमी है, वहीं यहां पर भौतिक संसाधन के रूप में भी कमियां ही कमियां हैं। अभी तक विभाग  के पास कंप्यूटर सिस्टम ही पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं। विभाग का सॉफ्टवेयर जो पूर्व की कंपनी से अपडेट होता रहा है, वह वर्तमान में एनआईसी को सौंपा गया, किंतु वह भी इसमें सुधार नहीं कर पाया। इस कारण विभाग के नामांतरण और शुल्क वसूली के साथ ही जमा की गई राशि का अपडेशन भी समय पर नहीं हो पा रहा है। जिले में व्यपवर्तित भूमियों की जानकारी तहसील में भेजे जाने के बावजूद आज तक  कई जमीनों का नामांतरण नहीं हो पाया है। इसी तरह जमीनों के नामांतरण के बाद तहसील ने नामांतरण की प्रक्रिया को अपनाया ही नहीं है।  जिले की तहसीलों में इस तरह के सैकड़ों मामले लंबित बताए जाते हैं। नियमानुसार 2200 वर्ग मीटर से अधिक भूमि के नामांतरण पर भू-परिवर्तन शाखा को तहसीलदार को पत्र लिखकर नामांतरण की जानकारी देना अनिवार्य है, जिसके आधार पर तहसीलदारों को अपने राजस्व रिकॉर्ड में भी इस तरह का नामांतरण करना होता है। कम वर्ग फ़ीट वाली भूमि के लिए आवेदक स्वयं नामांतरण के आवेदन तहसील में करता है, किंतु इस तरह के आवेदनों पर तहसील में कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। तहसील में इस तरह के नामांतरण आवेदन लोक सेवा से जुड़े नहीं होने से समय सीमा में बंधे नहीं हैं। कई तहसीलों में इस तरह के आवेदन सीधे नहीं लिए जा रहे हैं। 

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