पर्यावरण की प्रबंधन व संरक्षण जरूरी


पर्यावरण प्रदूषण के विभिन्न रूपों ने पर्यावरण तथा आम आदमी को बहुत नुकसान पहुंचाया है। पर्यावरण के विभन्न प्रदूषणों की वजह से पारिस्थितकीय असंतुलन का खतरा बढ़ता जा रहा है। जिससे मनुष्य के साथ-साथ वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं का जीवन संकट ग्रस्त होता जा रहा है। इस पर्यावरण संकट से उबरने के लिए पर्यावरण संरक्षण एवं प्रबंधन ही एक मात्र मार्ग है जिसके द्वारा पर्यावरण संकट को नियंत्रित किया जा सकता है। पर्यावरण प्रबंधन एवं संरक्षण का मूल उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों का युक्ति संगत उपयोग, शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा, आर्थिक मूल्यों को नई दिशा प्रदान करना एवं शुद्ध पर्यावरण प्रदान करना है। यह कार्य व्यष्टि से न होकर समष्टि से ही संभव है। इसमें प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाएं एवं प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि हम पर्यावरण की शुद्धि चाहते हैं तथा कलांतर में उसे स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धक बनाए रखना चाहते हैं तो हमें इसके संरक्षण एवं प्रबंधन पर समुचित ध्यान देना होगा।



जल प्रदूषण


जल वैश्विक संपत्ति है। इसके संरक्षण से न सिर्फ स्थानीय लोगों को मदद पहुंचती है, अपितु उस क्षेत्र के वनस्पति और प्राणी भी लाभान्वित होते हैं। जल के अभाव में इस संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है चूंकि, जल ही जीवन है। पौधे का प्रथम भोज्य जल ही है। जल है तो कल है, जो दुनिया का सबसे मूल्यवान संसाधन है। 21वीं सदी का संकट जल संकट है। वर्तमान में जल के लगभग सभी स्रोत प्रदूषित हैं। जल प्रदूषण से तात्पर्य है कि बाहरी पदार्थों द्वारा जल स्रोतों का प्रदूषित होना। 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' जल प्रदूषण को इस प्रकार परिभाषित करता है-प्राकृतिक या अन्य स्रोत से कोई बाहरी पदार्थ जो जल आपूर्ति या स्रोत को प्रदूषित करता है, जल प्रदूषण कहलाता है। जल प्रदूषण के प्रमुख कारकों में घरेलू व्यर्थ पदार्थ, वाहित मल, औद्योगिक अपशिष्ट, कीटनाशी पदार्थ, उर्वरकों के रासायनिक तत्व व पेट्रोलियम पदार्थ सम्मिलित हैं, जो पानी जीवन की रक्षा करता है, वही प्रदूषित हो जाने पर बीमारियों तथा मृत्यु का कारण बनता है। विकासशील देशों में मरने वाले पांच बच्चों में से चार पानी की गंदगीके कारण उत्पन्न हुए रोगों जैसे टाइफाइड, पीलिया, हैजा, पेचिश, पेट में कीड़े और यहां तक कि मलेरिया, जोकि गंदे गहरे पानी में पाए जाने वाले मच्छरों के कारण होतानगर निगम के सीवरों के गंदे पदार्थों के समुचित शोधन के पश्चात ही उसे जल स्रोतों में डालना चाहिए। घर के बेकार जल का उपयोग कृषि कार्य हेतु करना चाहिए। यह उद्यान किचिन, गार्डन तथा कृषि के लिए लाभदायक हैउद्योगों के विषेले पदार्थों के जल स्रोतों में निष्कासन के प्रति कठोर नियम होने चाहिए। प्रत्येक उद्योग को अपनी गंदगी शोधन व्यवस्था खुद करनी चाहिए। मानक स्तर के कीटीकनाशकों का ही प्रयोग होना चाहिए। देश में जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 लागू है। इसको प्रभावी ढंग से लागू करने के साथ-साथ सभी लोगों का समुचित योगदान भी जल प्रदूषण की रोकथाम में वांछनीय है।


भूमि प्रदूषण


भूमि का प्राकृतिक संसाधनों में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों तथा अपशिष्ट पदार्थों का विलय प्रायः भूमि में होता रहता है, जिसके कारण मनुष्य तथा अन्य जीवधारियों का जीवन प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता है। इस प्रकार भूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में ऐसा कोई अवांछित परिवर्तनड जिसका हानिकारक प्रभाव मनुष्य तथा न्य जीवों पर पड़ता है या जिससे भूमि की प्राकृतिक गुणवत्ता तथा उपयोगिता नष्ट हो जाती है, भूमि प्रदूषण कहलाता है।


भूमि प्रदूषण के कारकों में जीवनाशक रसायन, कृत्रिम उर्वरक, नगरीय अपशिष्ट पदार्थ, जहरीले कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है। जीवनाशक रसायनों में कीटनाशक, फफूदी नाशक, खरपतवार नाशक आदि आते हैं। कृषि उत्पादन में वृद्धि तथा घातक रोगों से मुक्ति दिलाने में इनका महत्वपूर्ण स्थान रहा है। दूसरी ओर इनके असंतुलित प्रयोग से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है। कृत्रिम उर्वरकों के अनियमित प्रयोग से भूमि में कुछ तत्वों की अधिकता तथा विषैलापन हो जाता है। नगरों में सीवेज में विद्यमान फफूदी, जीवाणु, विषाणु तथा भारी तत्वों का भू-गर्भ जल तथा भूमि पर उगाई जाने वाली फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


भूमि प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु रसायनिक उर्वरकों, खरपतवारनाशी, फरूंदनाशी एवं कीटनाशी रसायनों का प्रयोग कम करके इनके स्थान पर जैविक खाद, भू-परिष्करण क्रियाओं को प्राथमिकता देनी होगी। प्लास्टिक, पालीथीन की थैलियों, टिन आदि को रिसाइकिल करके इनका पुनउँपयोग किया जाना चाहिए |


औद्योगिक प्रदूषण


औद्योगिक प्रदूषण औद्योगिकीकरण में वृद्धि के फलस्वरूप जल, वायु एवं भूमि प्रदूषणों के साथ-साथ शोर की मात्रा में भी दिनों-दिन वृद्धि होती जा रही है। ध्वनि प्रदूषण आधुनिकीकरण की ही देन है। शोर अर्थात ध्वनि प्रदूषण को उस ध्वनि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो श्रोता को अरुचिकर लगे। ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता की माप करने के लिए जिस इकाई का प्रयोग किया जाता है उसे डेसिबल कहते हैं। सामान्यत 55 से 60 डेसिबल का शोर हमारे लिए सहनीय होता है इससे अधिक तीव्रता का शोर मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालता है।


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